सचेतन 257: शिवपुराण- वायवीय संहिता – भाव योग उच्चाति-उच्च प्रेम है

भाव योग की प्रक्रिया में संन्यासी का अर्थ महत्वपूर्ण है 

कल हमने द्वेष के बारे में बात किया था और यह किसी दुःख के अनुभव होने के पश्चात् जो वासना चित्त में शेष रह जाती है, वह ‘द्वेष’ क्लेश कहलाती है। अगर हम बात करें तो दुःख के आभास होने या जिससे दुःख को हम जानने या समझने लगते है या कोई दुःखदायी वस्तुओं अथवा प्राणियों की स्मृति हमारे मन में आ जाती है अथवा उसके साधन के प्रति क्रोध अथवा उन दुःखों को नष्ट करने की इच्छा होने लगती है तो ही वह ‘द्वेष’ कहलाती है।

सनातन या यौगिक प्रक्रिया में संन्यासी को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है जो सहनशीलता का परिचायक है और आप अगर ध्यान दें तो महात्मा गांधी जी का भी कहना था की दूसरों के अतिवादों अर्थात् कठोर वचना को सहन करने का अभ्यास करना चाहिए, किसी का अनादर नहीं करना चाहिए तथा इस नश्वर देह के लिए किसी से वैर न करे अर्थात् किसी के लिए द्वेष भाव न रखे। यही तो संन्यास है। 

आप अगर सनातन धर्म में संन्यासी की बात करें तो हमारी परंपरा में इस प्रकार गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला संन्यासी मुण्डन युक्त, अपरिग्रही, पवित्र, किसी के प्रति द्रोह अर्थात् द्वेष से रहित, भिक्षाचरण करता हुआ ब्रह्मपद को प्राप्त होता है।

राग-द्वेष, दोनों क्लेशों (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं) का साथ में उल्लेख किया जाता है। राग सुखदायक वस्तुओं में लोभ तथा द्वेष दुःखदायी पदार्थ के प्रति क्रोध अथवा घृणा को प्रकट करता है। संन्यासी के नियम में यह बताया गया है कि संन्यासी राग-द्वेष, मद, माया, दूसरों के प्रति द्रोह तथा अपनों के प्रति मोह – इन छः बाताें काे कभी मन में नहीं आने दे। संन्यासी दुःख में उद्विग्न और सुख में निस्पृह रहता है। राग को त्यागकर वह शुभ-अशुभ के प्रति स्नेहहीन (आसक्ति रहित) हो जाता है। वह संन्यासी न द्वेष करता है, न मुदित होता है। इस प्रकार राग-द्वेष को त्यागकर संन्यासी की समस्त इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं। 

भाव-जगत में मनुष्य बहुत-सी बातों का अनुभव करता है, क्या वे वास्तविक सत्य हैं या कल्पना से उत्पन्न होती हैं?

इसका उत्तर है की यह दोनों ही बातें हो सकती हैं। भाव का अर्थ केवल कल्पना ही नहीं है। गीता के ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ में भावका अर्थ है सत-सदा रहनेवाला। ‘सत्‌’ का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।’ 

भाव का अर्थ है उच्चाति-उच्च प्रेम। आप उच्चतम  प्रेम की पराकाष्टा का बहुत उदाहरण सुने हैं कहते है प्रेम में भगवान श्रीकृष्ण को ‘रसराज’ और रासेश्वरी श्रीराधाजीको “महाभाव’ कहा गया है।

आजकल “भाव’ का प्रयोग बहुत हलके अर्थ में होता है। भाव और भावना में कोई अन्तर नहीं माना जाता। बंगाल में तो भावना का प्रचलित अर्थ है-‘चिन्ता’। भावना करते-करते जिस वस्तु का जो रूप बन जाय, उसका नाम भी “भाव’ कहा जाता है।

भाव से भावित पुरुष में होनेवाली मनोवृत्ति को भावुकता कहते हैं। भावुकता का चलता फिरता अर्थ है भाव प्रवण यानी कल्पना में विचरण करने वाला व्यक्ति, जो विचारशील नहीं है या विवेकहीन-मूढ़ है। प्रेम तथा अनुराग को भी ‘भाव’ कहते हैं। प्रेम, अनुराग आदि के भाव जो अन्तस्तल में उठते हैं, उनको भी भावुकता कहते हैं। ऐसे प्रेमी व्यक्तियों को हृदय भावना करते-करते द्रवीभूत हो जाता है। श्रद्धालुओं को भी भावुक कहते हैं। भावुक व्यक्ति भावना के अनुसार अनेक प्रकारकी कल्पना करके उसके राज्य में विचरते रहते हैं। 

भाव का सर्वथा अर्थ “पवित्र प्रेम” के लिए होता है। भगवान का जो आनन्दस्वरूप है, उनकी जो स्वरूपभूता हृदयदिनी शक्ति है, अन्तरंगा शक्ति है, वही आनन्द-शक्ति है, वही ‘भाव’ है; वही मूर्तिमान होकर महाभावस्वरूपा श्रीराधिके जीके दिव्य विग्रह रूपमें प्रकट है।

जहाँ-जहाँ भक्त अपनी दृष्टि से भाव की बात कहता है, वहीं वह भगवान के यथार्थ प्रभाव की ही बात कहता है, कल्पना-प्रसूत भावना से नहीं अपने मन से मिला होता है जिसमें प्राणों का विलय कर दिया जाता है और हम ईश्वर के लिये ही अपने शारीरिक कर्मो का भी उत्सर्ग कर देते हैं।

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