सचेतन 241: शिवपुराण- वायवीय संहिता – योग-निरूपण

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सचेतन 241: शिवपुराण- वायवीय संहिता – योग-निरूपण

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 मंत्र योग, स्पर्श योग, भावयोग, अभाव योग और महायोग

मुनि उपमन्यु बोले, हे केशव ! अब मैं आपको योग विधि के बारे में बताता हूं। जिसके द्वारा सभी विषयों से निवृत्ति हो और अंतःकरण की सब वृत्तियां शिवजी में स्थित हो जाएं, वह परम योग है। आपका शून्य होना ही आपका प्राकृतिक गुण है क्योंकि इस गुण के रूप में शिव आपके साथ विराजमान हैं। 

योग पांच प्रकार का होता है। मंत्र योग, स्पर्श योग, भावयोग, अभाव योग और महायोग। मंत्रों का उनके अर्थ सहित ज्ञान होना महायोग कहलाता है। योग का अर्थ है ऐसी क्रियाएं, जो मनुष्य की समस्त प्रवृत्तियों को शुद्ध कर उसे शिव से एकाकार कराती है। योग के पाँच विभाग निम्नलिखित हैं-

मंत्र योग यानी आपकी वाणी और वचन जो आपके मन में स्थित है। स्पर्श योग यानी स्पर्श का मिलन, भाव योग यानी भक्ति द्वारा मिलन, अभाव योग का अर्थ है भावनात्मक रूप से जुड़े बिना मिलन, महायोग महान मिलन है। 

मंत्र योग मनुष्य को मंत्रों का अर्थ समझने और मन को एकाग्र कर शिव से मिलाने में मदद करता है। 

जब मंत्र योग प्राणायाम के अभ्यास से सिद्ध हो जाता है तो उसे ‘स्पर्शयोग’ कहा जाता है।

भावयोग का अर्थ है बिना एक शब्द बोले ध्यान और जप करना।

अभाव योग का अर्थ है ऐसा मिलन जब भक्त दुनिया से भावनात्मक रूप से जुड़े बिना अंतिम विनाश पर विचार करता है।

जिस व्यक्ति का मन शिव के विचारों में लीन रहता है, माना जाता है कि उसने महायोग की स्थिति प्राप्त कर ली है। एक योगी प्राणायाम आदि की सहायता से अपने शरीर को शुद्ध करके शिव से एकाकार हो सकता है।

योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर और आत्मा ( ध्यान ) को एकरूप करना ही योग कहलाता है। मन को शब्दों से मुक्त करके अपने आपको शांति और रिक्तता से जोडने का एक तरीका है योग। सबसे पहले ‘योग’ शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। 

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