सचेतन 2.43: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – रावण के पानभूमि (मदिरालय) और भिन्न भिन्न मदिरा का वर्णन

अंतःपुर में सोती हुई स्त्रियों को देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्म के भय से शंकित हो उठे।  

हमने बात किया था की अनुमान से ज्ञान का होना और हनुमान जी मंदोदरी को सोती देखकर प्रत्यक्ष (इंद्रिय सन्निकर्ष) में सोच रहे थे की यही सीता माता हैं लेकिन जब उनको सीता जी के अस्तित्व का ज्ञान और आभास हुआ तो अप्रत्यक्ष में सीता जी के अस्तित्व के सभी संकेत और पहचान ही बदल गये।

स्वार्थ अनुमान के कारण एक बार हनुमान जी की मानसिक प्रक्रिया मंदोदरी को ही सीतामाता समझ बैठे लेकिन परमार्थ अनुमान में सीतामाता के अन्य पक्ष को सोच कर उनके अस्तित्व का नि:शंक निश्चय किया। 

अनुमान लगाने के लिए अपने मनोगत को पाँच अंगों प्रयोग किया जाना चाहिए। एक प्रतिज्ञा के – साथ हनुमान जी का सीता माता की खोज का लक्ष्य, हनुमान जी किस हेतु – लंका में प्रवेश किया और रावण के अंतःपुर में रावण की विभिन्न भार्याओं का निरीक्षण और उनके पास मंदोदरी को देख कर सीता माता उदाहरण के दृष्टांतों प्राप्त हुए लेकिन यह समझना की इस दशा में सीता जी न तो सो सकती हैं, और फिर मदिरापान का सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं। साध्य यानी लक्ष्य तक आने के लिए उपनय – करना यानी हनुमान जी का अपनी स्वाभाविक स्थिति में लौटकर आना और फिर से सीताजी के विषय में दूसरे प्रकार से चिन्ता करने लगना  लगे और तर्क के आधार को इकट्ठा करके के निगमन – करना कि सीता माता लंका पूरी में ही हैं। 

अब हनुमान जी का पुनः अन्तःपुर में और रावण की पानभूमि (वह स्थान जहाँ एकत्र होकर लोग शराब पीते हैं) में सीता का पता लगाना, जिससे उनकी धर्मलोप की आशंका का स्वतः निवारण हो गया। उस महाकाय राक्षसराज के भवन में कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न थी। उस मधुशाला में अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरों के मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान जी ने देखा। 

वानरसिंह हनुमान् ने वहाँ सोने के बड़े-बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, साही, हरिण तथा मयूरों के मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे।वे अभी खाये नहीं गये थे। 

कृकल नामक पक्षी, भाँति-भाँति के बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़ें ये सब-के-सब राँध-पकाकर रखे हुए थे। इनके साथ अनेक प्रकार की चटनियाँ भी थीं। भाँति-भाँति के पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे। जीभ की शिथिलता दूर करने के लिये खटाई और नमक के साथ भाँति-भाँति के राग* और खाण्डव भी रखे गये थे।

अंगूर और अनार के रस में मिश्री और मधु आदि मिलाने से जो मधुर रस तैयार होता है, वह पतला हो तो ‘राग’ कहलाता है और गाढ़ा हो जाय तो ‘खाण्डव’ नाम धारण करता है। अच्छी छौंक-बघार से तैयार किये गये नाना प्रकार के विविध मांस चतुर रसोइयों द्वारा बनाये गये थे और उस पानभूमि में पृथक्-पृथक् सजाकर रखे गये थे। उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ (जो कदम्ब आदि वृक्षों से स्वतः उत्पन्न हुई थीं) और कृत्रिम सुराएँ (जिन्हें शराब बनाने वाले लोग तैयार करते हैं) भी वहाँ रखी गयी थीं। उनमें शर्करासव, माध्वीक,२ पुष्पासवरे और फलासव भी थे। इन सबको नाना प्रकार के सुगन्धित चूर्णो से पृथक्-पृथक् वासित किया गया था।

शर्करा से तैयार की हुई सुरा ‘शर्करासव’ कहलाती है। मधु से बनायी हुई ‘मदिरा’, महुआ के फूल से तथा अन्यान्य पुष्पों के मकरन्द से बनायी हुई सुरा को ‘पुष्पासव’ कहते हैं और द्राक्षा आदि फलों के रससे तैयार की हुई ‘सुरा’।

उस अन्तःपुर में स्त्रियों की बहुत-सी शय्याएँ सूनी पड़ी थीं और कितनी ही सुन्दरियाँ एक ही जगह एक-दूसरी का आलिंगन किये सो रही थीं। उस राक्षसराज के भवन में कोई साँवली, कोई गोरी, कोई काली और कोई सुवर्ण के समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ सो रही थीं। 

निद्रा के वश में होने के कारण उनका काममोहितरूप मुँदे हुए मुखवाले कमलपुष्पों के समान जान पड़ता था। इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान् ने रावण का सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीता का दर्शन नहीं हुआ।

उन सोती हुई स्त्रियों को देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्म के भय से शंकित हो उठे। उनके हृदय में बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया। जिससे उनकी धर्मलोप की आशंका होने लगी हनुमान जी को लगा की क्या यह देखना अधर्म तो नहीं है।लेकिन इस शाका का स्वतः निवारण हो गया। 

वे सोचने लगे कि ‘इस तरह गाढ़ निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। यह तो मेरे धर्म का अत्यन्त विनाश कर डालेगा। ‘मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियों पर नहीं पड़ी थी। यहीं आने पर मुझे परायी स्त्रियों का अपहरण करने वाले इस पापी रावण का भी दर्शन हुआ है (ऐसे पापी को देखना भी धर्म का लोप करने वाला होता है) । 

तदनन्तर मनस्वी हनुमान जी के मन में एक दूसरी विचारधारा उत्पन्न हुई। उनका चित्त अपने लक्ष्य में सुस्थिर था; अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्य का ही निश्चय कराने वाली थी। 

(वे सोचने लगे—) ‘इसमें संदेह नहीं कि रावण की स्त्रियाँ निःशंक सो रही थीं और उसी अवस्था में मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है।

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