सचेतन 165 : शंकराचार्य सनातन धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है

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जगद्गुरु के तौर पर सत्ययुग में वामन, त्रेतायुग में सर्व गुरू ब्रम्हर्षि वशिष्ठ थे, द्वापर के सर्वगुरू वेदव्यास थे।

आदिशङ्कराचार्य ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। भगवद्गीता, उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने सांख्य दर्शन का प्रधानकारणवाद और मीमांसा दर्शन के ज्ञान-कर्मसमुच्चयवाद का खण्डन किया। परम्परा के अनुसार उनका जन्म 508-9 ईसा पूर्व तथा महासमाधि 477 ईसा पूर्व में हुई थी।

इन्होंने भारतवर्ष में चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं- (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये शंकर के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है।

उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। 

वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया। 

शंकराचार्य धर्मसम्राट पद, शिव अवतार भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित सत्य सनातन धर्म के आधिकारिक मुखिया के लिये प्रयोग की जाने वाली उपाधि है। शंकराचार्य हिन्दू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है जो कि बौद्ध पंथ में दलाईलामा एवं ईसाई रिलीजन में पोप कि तरह मानव निर्मित नहीं बल्कि स्वयं ईश्वर अवतार द्वारा स्थापित है। 

इस पद की परम्परा आदि गुरु शंकराचार्य ने आरम्भ की। यह उपाधि आदि शंकराचार्य, जो कि शिव अवतार, हिन्दू दार्शनिक एवं संपूर्ण कलियुग के धर्मगुरु थे एवं जिन्हें हिन्दुत्व के सबसे महान प्रतिनिधियों में जाना जाता है, के नाम पर है। 

उनका जन्म कालड़ी, केरला में हुआ था, उन्हें जगद्गुरु के तौर पर मान्यता प्राप्त है एक उपाधि जो हर युग मे एक ऋषि को प्राप्त होती है। सत्ययुग में वामन, त्रेतायुग में सर्व गुरू ब्रम्हर्षि वशिष्ठ थे, द्वापर के सर्वगुरू वेदव्यास थे। भगवान कृष्ण ही सर्वकालिक अखिल गुरू हैं। 

सनातन धर्म की प्रतिष्ठा हेतु भारत के चार क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किये तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उन पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को आसीन किया। उनसे शास्त्रार्थ में पराजित श्री मंडन मिश्र पहले शंकराचार्य थे। तबसे इन चारों मठों में शंकराचार्य पद की परम्परा चली आ रही है। यह पद हिन्दू धर्म का सर्वोच्च गौरवमयी पद माना जाता है।

चार मठ निम्नलिखित हैं जिन पर चयन भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा प्रदत्त मठाम्नाय महानुशासन संविधान ग्रंथ अनुसार होता है।

उत्तराम्नाय मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है। जिसके शंकराचार्य ब्रम्हलीन स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी के ईश्वी सन् 2022 में देहत्याग कर बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अभिषिक्त हुए हैं।

पूर्वाम्नाय मठ या पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ जो कि पुरी में स्थित है जिसके वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी 1992 से हैं, वे धर्म सम्राट स्वामी हरिहरात्मक सरस्वती “करपात्री” जी महाराज के शिष्य हैं। पूर्ववर्ती शंकराचार्य ब्रम्हलीन स्वामी निरंजनदेव तीर्थ ईश्वी सन् 1960-1992 थे और उनके भी पूर्ववर्ती स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ ईश्वी सन् 1924 से 1960 तक थे।

दक्षिणाम्नाय मठ या दक्षिणी मठ, शृंगेरी शारदा पीठ जो कि शृंगेरी, कर्नाटक में स्थित है।जिसके वर्तमान शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ हैं।

पश्चिमाम्नाय मठ या पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है। जिसमें स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बाद ईश्वी सन् 2022 में स्वामी सदानंद अभिषिक्त हुए है।

इन चार मठों के अतिरिक्त भी भारत में कई अन्य जगह शंकराचार्य पद लगाने वाले मठ मिलते हैं जो वैदिक ईश्वरीय परम्परानुसार नहीं बल्कि स्वैच्छिक मानव निर्मित हैं। पद लोलुप लोगों ने अपने मठ स्थापित कर लिये एवं अपने नाम के आगे भी शंकराचार्य उपाधि लगाने लगे। परन्तु वास्तविक शंकराचार्य उपरोक्त चारों मठों पर महानुशासन आसीन को ही माना जाता है।

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