सचेतन 2.58: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – रावण आभूषणों से विभूषित होकर भी श्मशानचैत्य (मरघट में बने हुए देवालय)- की भाँति सीता जी को भयंकर प्रतीत होता था।

विभिन्न राक्षसियों का अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करना। 

कल मैंने बात किया था की काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा होता है और जिसके प्रति आप जैसे भी बँध जाते हैं वैसे ही उसके प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है।रावण के मन में सीता के प्रति काम (प्रेम) तो विस्तृत बो रहा था जब की सीता हमेंशा रावण को धिक्कार करती रहती थी और अहसास दिलाती थी की वो मैं धर्मात्मा श्रीराम की धर्मपत्नी और महाराज दशरथ की पुत्रवधू हूँ। रावण को कहती थी की पापी ! मुझसे पाप की बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है ? दशमुख रावण! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त है। केवल श्रीराम की आज्ञा न होने से और अपनी तपस्या को सुरक्षित रखने के विचार से मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ। मैं मतिमान् श्रीराम की भार्या हूँ, मुझे हर ले आने की शक्ति तेरे अंदर नहीं थी। निःसंदेह तेरे वध के लिये ही विधाता ने यह विधान रच दिया है। तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेर का भाई है और तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीराम को छल से दूर हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्री की चोरी की है? 

पर्वत के समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओं से उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरों से मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो। प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण-पीत कान्तिवाले दो कुण्डल उसके कानों की शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलों से युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वत को सुशोभित कर रहे हों। 

वह अभिनव शोभा से सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्त के समान जान पड़ता था। आभूषणों से विभूषित होने पर भी श्मशानचैत्य* (मरघट में बने हुए देवालय)-की भाँति भयंकर प्रतीत होता था। प्राचीनकाल में नगर की श्मशानभूमि के पास एक गोलाकार देवालय-सा बना रहता था, जहाँ राजा की आज्ञा से प्राणदण्ड के अपराधियों का जल्लादों के द्वारा वध कराया जाता था। जब वहाँ किसी को प्राणदण्ड देने का अवसर आता, तब उस देवालय को लीप-पोतकर फूलों की बन्दनवारों से सजाया जाता था। उस विभूषित श्मशानचैत्य को देखते ही लोग यह सोचकर भयभीत हो उठते थे कि आज यहाँ किसी के जीवन का अन्त होने वाला है। इस तरह जैसे वह श्मशानचैत्य विभूषित होने पर भी भयंकर लगता था, उसी प्रकार रावण सुन्दर शृङ्गार करके भी सीता को भयानक प्रतीत होता था; क्योंकि वह उनके सतीत्व को नष्ट करना चाहता था।

रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीता की ओर देखा और फुफकारते हुए सर्प के समान लम्बी साँसें खींचकर कहा- अन्यायी और निर्धन मनुष्य का अनुसरण करने वाली नारी! जैसे सूर्यदेव अपने तेज से प्रातःकालिक संध्या के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा विनाश किये देता हूँ।मिथिलेशकुमारी से ऐसा कहकर शत्रुओं को रुलाने वाले राजा रावण ने भयंकर दिखायी देने वाली समस्त राक्षसियों की ओर देखा। 

राक्षस प्राचीन काल के प्रजाति का नाम है।राक्षस वह है जो आर्य व्यवहार ,व्यवस्था, विचार का शत्रु, विधान और मैत्री में विश्वास नहीं रखता और परायाधन परायी स्त्री व वस्तुओं को हडप करना चाहता है। मानव जाति के समाज को बरबाद करने में ही अपना यश मानने वाला तथा यज्ञकार्य का नाश करके ब्राह्मण वर्ण के युवकों के मांस का भक्षण करने वाला वर्ग राक्षस था। राक्षस दक्ष प्रजापति के वंशज थे। वे सुरसा के पुत्र थे जो स्वयं दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं। कहते हैं की रावण ने रक्ष प्रथा या रक्ष पंथ की स्थापना की थी। रक्ष पंथ को मानने वाले गरीब, कमजोर, विकास के पीछे रह गए लोगों को साथ रखते और उनकी नही मानने वालो का भक्षण करते थे। रक्ष पंथ में मानने वाले भी राक्षस कहलाते थे। राक्षस को अक्सर बदसूरत, भयंकर दिखने वाले और विशाल प्राणियों के रूप में चित्रित किया गया था, और रावण ने तरह तरह के अतृप्त नरभक्षी के रूप में दिखाया देने वाले राक्षसियों से कहा- तुम सब लोग मिलकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो।

उसने एकाक्षी (एक आँखवाली), एककर्णा (एक कान वाली), कर्णप्रावरणा (लंबे कानों से अपने शरीर को ढक लेने वाली), गोकर्णी (गौके-से कानों वाली), हस्तिकर्णी (हाथी के समान कानों वाली), लम्बकर्णी (लम्बे कान वाली), अकर्णिका (बिना कान की), हस्तिपदी (हाथी के-से पैरों वाली), अश्वपदी (घोड़े के समान पैरवाली), गोपदी (गाय के समान पैरवाली), पादचूलिका (केशयुक्त पैरों वाली), एकाक्षी, एकपादी (एक पैर वाली), पृथुपादी (मोटे पैर वाली), अपादि का (बिना पैरों की), अतिमात्रशिरोग्रीवा (विशाल सिर और गर्दन वाली), अतिमात्रकुचोदरी (बहुत बड़े-बड़े स्तन और पेट वाली), अतिमात्रास्यनेत्रा (विशाल मुख और नेत्रवाली), दीर्घजिह्वानखा (लंबी जीभ और नखों वाली), अनासिका (बिना नाक की), सिंहमुखी (सिंह के समान मुखवाली), गोमुखी (गौ के समान मुखवाली) तथा सूकरीमुखी (सूकरी के समान मुखवाली)—इन सब राक्षसियों से कहा- ‘निशाचरियो ! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग-अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, जिससे जनककिशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वश में आ जाय। अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *