सचेतन 2.6: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – संकल्प से कार्य सिद्धी होती है

काम की तैयारी में सबसे पहले आपने शारीरिक और मानसिक बल का विस्तार करना चाहिए 

जामवंत के सुन्दर वचन हनुमान जी के हृदय को बहुत ही भाए और सुनकर वे बोले हे भाई !  तुम लोग दुःख सहकर , कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना ।। 

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।। 2 ।।

यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय मे श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चलने की कामना किए और हनुमान जी कहते हैं की जब तक में सीताजी को देखकर लौट के आने से ही मुझे बहुत ही हर्ष होगा। 

इस चौपाई में पहली बात है की आपने इष्ट को हमेंशा हृदय में धारण करना और एक प्रार्थना का भाव होना उनके प्रति मस्तक को नवाकर रखना। और दूसरा भाव बड़ा ही सामान्य है की किसी काम को करने से पहले एक सरल और साधारण सा लक्ष्य का होना जैसे हनुमान जी का लक्ष्य एक सामान्य समझदारी वाला है की मैं की मुझे तो सीता माता को देखने से ही ख़ुशी मिलेगी और जब मैं उनको देखकर आने से ही मुझे बहुत ही हर्ष होगा।हम सभी को जीवन में कितना ही विशाल काम करना हो, हमारा लक्ष्य निर्धारण सामान्य समझदारी वाला होना चाहिए और उस काम से स्वयं को जोड़े की किस काम से आपको ख़ुशी मिल सकेगी। 

हनुमान जी पहले पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेव को प्रणाम किए और कार्यकुशल हनुमान जी दक्षिण दिशा में जाने के लिए बढ़ने लगे। काम के लिए जैसे ही हनुमान जी ने कमर कसा तो उन्होंने पहले अपने शरीर का विस्तार किया। 

आप जब भी काम की तैयारी करते हैं तो आपने शारीरिक बल और मानसिक बल का विस्तार करना मत भूलिए।हनुमान  जी ने भी सीता माता की खोज करने के कार्य की तैयारी में सबसे पहले अपने शरीर को विस्तार करने लगे। 

सिंधु तीर जीतने भी वानर थे वो एक अद्भुत दृश्य को देखा की हनुमान जी के शरीर का विस्तार जैसे जैसे बढ़ रहा था वैसे वैसे ही पूर्णिमा के दिन के समान समुद्र में ज्वार भाटा बढ़ता जा रहा था वहाँ एक विशाल वातावरण बनता जा रहा था। 

यह ज्वार भाटा जितना तेज हो रहा था उतना ही हनुमान जी के दृढ़ निश्चय को मजबूत कर रहा था। हनुमान जी का समुद्र लांघने और श्री राम के कार्य की सिद्धी का संकल्प बढ़ने लगा था। 

जब भी हमको संकल्प करना चाहिए या लक्ष्य बनाना है तो अपनी शारीरिक और मानसिक बल को विस्तार करने की ज़रूरत है जिसको देखकर आपके आसपास में एक समुद्र के ज्वार भाटा की तरह हमचल मच जाये। आपके संकल्प का इतना प्रभाव हो कि सबके के सब आपको देख कर दंग रह जाये। 

लोग आपको बहुत कुछ कहेंगे वो सराहना हो या प्रताड़ना हो लेकिन आपका  दृढ़ निश्चय मजबूत होना चाहिए, घबराहट से डरना नहीं चाहिय। आपके आस पास के वातावरण के हलचल जीतने विशाल होंगे उतना ही विशाल और मज़बूत आपका दृढ़ निश्चय होना चाहिए और यही तो हनुमान जी के चरित्र के वर्णन की विशेषता है की समुद्र लांघने के लिए और श्री राम के कार्य की सिद्धी के लिए उनका संकल्प बाधाओं से घबराया नहीं बल्कि विस्तार हुआ और बढ़ने लगा था।

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