सचेतन 2.34: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – सदा सनातन मार्ग पर स्थित रहने वाली माता सीता का चित्रण

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सचेतन 2.34: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – सदा सनातन मार्ग पर स्थित रहने वाली माता सीता का चित्रण

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मानसिक संकल्प से धर्म का मार्ग शुरू होता है 

वीर हनुमान्जी ने विभिन्न गृहों में ऐसी परम सुन्दरी रमणियों का अवलोकन किया, जो मनोऽभिराम प्रियतम का संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं। फूलों के हार से विभूषित होने के कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब-की-सब हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देती थीं।       
किंतु जो परमात्मा के मानसिक संकल्प से धर्ममार्ग पर स्थिर रहने वाले राजकुल में प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला है, जो परम सुन्दर रूप में उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लता के समान शोभा पाती थीं, उन कृशांगी (दुबले पतले शरीर की युवती, तन्वंगी, प्रियंगु लता) सीताको उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था। 
आज हम विचार करेंगे की मानसिक संकल्प से धर्ममार्ग पर स्थिर रहने की क्या क्या लक्षण हैं माता सीता जी के गुण विश्लेषण से समझ पायेंगे। वैसे मानसिक प्रक्रियाओं की बात करें तो हमारी संवेदन (Sensation), स्मृति, चिन्तन (कल्पना करना, विश्वास, तर्क करना आदि) संकल्प यानी किसी विषय पर दृड़ निश्चय होना और संवेग (emotion) आदि शामिल हैं।और सच मानिए अगर आप मानसिक रूप से स्वास्थ्य हैं तो यह ईश्वर की कृपा और आपका संकल्प है। आप मानसिक रूप से स्वास्थ्य हैं तो आपके जीवन में हमेंशा स्वयं के कल्याण की एक स्थिति बनी रहती है जिसमें आपको अपनी क्षमता का एहसास होता रहता है और चाहे आप कितने ही कष्ट और तनाव से जी रहे हैं तो भी आप सामान्य स्थिति बनाये रखेंगे। आपका भाव आपकी चेतना और आपके ध्यान की अवस्था विचलित नहीं होगी जो आपका संकल्प कहलाता है। 
जीवन में विश्वास और आस्था आपको एकात्म करके रखी है आपको स्वयं से सिर्फ़ उस विश्वास और आस्था को उसकी निरंतरता में बरकरार रखना होता है जिसको हम सनातन कहते हैं। 
माता सीता का चित्रण भी कुछ ऐसा ही है जो सदा सनातन मार्ग पर स्थित रहने वाली, श्री राम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीराम विषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोगकाल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक) से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था तथा जो वन में नृत्य करनेवाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाणके आघातसे उत्पन्न हुई रेखा- (चिह्न) सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। 
दृष्टिगोचर का अर्थ है- जो देखने में आए और हरिवंशराय बच्चन जी की कविता- 
पंथ जीवन का चुनौती दे रहा है हर कदम पर,
आखिरी मंजिल नहीं होती कहीं भी दृष्टिगोचर,
धूलि में लद, स्वेद में सिंच हो गई है देह भारी,
कौन-सा विश्वास मुझको खींचता जाता निरंतर?-
पंथ क्या, पंथ की थकान क्या,
स्वेद कण क्या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं।
मानसिक संकल्प की यही स्थिति और ठहराव जो आपको विशास देता वही सनातन का परिचायक बन कर माता सीता जी और वीर हनुमान जी दोनों की अवस्था में एक समानता का भाव लता है।इसी मानसिक संकल्प से धर्म का मार्ग शुरू होता है 
वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्र जी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान्जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये।

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