सचेतन 169 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- स्वाध्याय के लाभ

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सचेतन 169 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- स्वाध्याय के लाभ

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स्वाध्याय से आत्मा मिथ्या ज्ञान का आवरण दूर होता है 

स्वाध्याय से हम आध्यत्मिक साधना कर सकते हैं जो ज्ञान के प्रकाश से प्राप्त होता है, और इससे समस्त दु:खों का क्षय हो जाता है। वस्तुत: स्वाध्याय ज्ञान प्राप्ति का एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। 

स्वाध्याय शब्द का सामान्य अर्थ है-स्व का अध्ययन। स्वाध्याय आत्मानुभूति है, अपने अन्दर झांक कर अपने आप को देखना है, स्वयं अपना अध्ययन करना होता है। मेरी दृष्टि में अपने विचारों, वासनाओं व अनुभूतियों को जानने व समझने का प्रयत्न ही स्वाध्याय है। वस्तुत: वह अपनी आत्मा का अध्ययन ही है, आत्मा के दर्पण में अपने को देखना है। 

उत्तराध्ययन सूत्र में यह बताया गया है कि स्वाध्याय से जीव को क्या लाभ होता है?

उत्तराध्ययन सूत्र जैन आगम साहित्य का प्रतिनिधि आगम है। इसमें जीवन निर्माण के सूत्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

इसके उत्तर में कहा गया है कि स्वाध्याय से ज्ञानावरण कर्म का क्षय होता है। दूसरे शब्दों में आत्मा मिथ्या ज्ञान का आवरण दूर करके सम्यग्ज्ञान का अर्जन करता है। स्वाध्याय के इस सामान्य लाभ की चर्चा के साथ उत्तराध्ययन सूत्र में स्वाध्याय के पाँचों अंगों- वाचना, प्रतिपृच्छना, धर्मकथा आदि के अपने-अपने क्या लाभ होते हैं इसकी भी चर्चा की गयी है, जो निम्न रूप में पायी जाती है-

वाचना (अध्ययन) से जीव को क्या प्राप्त होता है?

वाचना से जीव कर्मों की निर्जरा करता है, श्रुतज्ञान की आशातना के दोष से दूर रहने वाला वह तीर्थ-धर्म का अवलम्बन करता है तथा गणधरों के समान जिज्ञासु शिष्यों को श्रुत प्रदान करता है। तीर्थ-धर्म का अवलम्बन लेकर कर्मों की महानिर्जरा करता है और महापर्यवसान (संसार का अन्त) करता है। आशातना का अर्थ है अशिष्ट व्यवहार आय का अर्थ है सम्यग् दर्शन आदि की प्राप्ति और शातना का अर्थ है विनाश |जो आय का विनाश करती है, वह आशातना है | चरित्रवान् , तपस्वी, ज्ञानी तथा ज्ञान आदि की अवहेलना को आशातना कहते हैं |

प्रतिपृच्छना से जीव को क्या प्राप्त होता है?

प्रतिपृच्छना (पूर्वपठित शास्त्र के सम्बन्ध में शंका निवृत्ति के लिए प्रश्न करना) से जीव सूत्र, अर्थ और तदुभय अर्थात् दोनों से सम्बन्धित आकांक्षा मोहन (संशय) का निराकरण करता है।

परावर्तना से जीव को क्या प्राप्त होता है?

परावर्तना से अर्थात् पठित पाठ के पुनरावर्तन से व्यंजन (शब्दपाठ) स्थिर होता है और जीव पदानुसारिता आदि व्यंजना-लब्धि को प्राप्त होता है।

अनुप्रेक्षा से जीव को क्या प्राप्त होता है?

अनुप्रेक्षा अर्थात् सूत्रार्थ के चिन्तन-मनन से जीव आयुष्य कर्म को छोड़कर शेष ज्ञान वरणादि सात कर्मों की प्रकृतियों के प्रगाढ़ बन्धन को शिथिल करता है। उनकी दीर्घकालीन स्थिति को अल्पकालीन करता है। उनके तीव्र रसानुभाव को मन्द करता है। बहुकर्म-प्रदेशों को अल्प प्रदेशों में परिवर्तित करता है। आयुष्य कर्म का बन्ध कदाचित् करता है, कदाचित् नहीं भी करता है। असातावेदनीयकर्म का पुन:-पुन: उपचय नहीं करता है। जो संसार अटवी अनादि एवं अनन्त है, दीर्घमार्ग से युक्त है, जिसके नरकादि गतिरूप चार अन्त (अवयव) है, उसे शीघ्र ही पार करता है।

जिस प्रकार बेड़ी स्वाधीनता में बाधक है, उसी प्रकार जो कर्म परमाणु आत्मा को विभिन्न शरीरों में नियत अवधि तक कैद रखते हैं, उन्हें आयुष्य कर्म कहते हैं। यह कर्म निश्चय करता है कि आत्मा को किस शरीर में कितनी समयावधि तक रहना है। आयुष्य कर्म चार प्रकार का है – (१) नरक आयु, (२) तिर्यंच आयु (वानस्पतिक एवं पशु जीवन), (३) मनुष्य आयु और (४) देव आयु।

धर्मकथा (धर्मोपदेश) से जीव को क्या प्राप्त होता है?

धर्मकथा से जीव कर्मों की निर्जरा करता है और प्रवचन (शासन एवं सिद्धान्त) की प्रभावना करता है। प्रवचन की प्रभावना करने वाला जीव भविष्य में शुभ फल देने वाले पुण्य कर्मों का बन्ध करता है।

इसी प्रकार स्थानांगसूत्र में भी शास्त्र अध्ययन से क्या लाभ हैं? इसकी चर्चा उपलब्ध होती है। इसमें कहा गया है कि सूत्र की वाचना से पाँच लाभ हैं-

१. वाचना से श्रुत का संग्रह होता है अर्थात् यदि अध्ययन का क्रम बना रहे तो ज्ञान की वह परम्परा अविच्छिन्न रूप से चलती रहती है। 

२. शास्त्राध्ययन-अध्यापन की प्रवृत्ति से शिष्य का हित होता है, क्योंकि वह उसके ज्ञान की प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन है। 

३. शास्त्राध्ययन अर्थात् अध्यापन की प्रवृत्ति बनी रहने से ज्ञानावरण कर्म की निर्जरा होती है अर्थात् अज्ञान का नाश होता है। 

४. अध्ययन-अध्यापन की प्रवृत्ति के जीवित रहने से उसके विस्मृत होने की सम्भावना नहीं रहती है। 

५. जब श्रुति स्थिर रहता है तो उसकी अविच्छिन्न परम्परा चलती रहती है।

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