सचेतन 2.60: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – स्वामी ही गुरु हैं, और उनमें ही अनुरक्तता होना चाहिए

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सचेतन 2.60: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – स्वामी ही गुरु हैं, और उनमें ही अनुरक्तता होना चाहिए

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सीता जी को क्रमशः त्रिजटा तत्पश्चात् एकजटा आदि राक्षसीयों ने क्रोध से लाल आँखें डराया और रावण के प्रति झुकाने की कोशिश भी किया और कहा की ‘देवि! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।

सीताजी ने राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर दिया तथा राक्षसियों ने उन्हें मारने-काटने की धमकी भी दिया। लेकिन सीता जी की अनुरक्त यानी उनका मोहित होना सिर्फ़ रामचंद्र जी के प्रति था।

तदनन्तर विकराल मुखवाली उन समस्त राक्षसियों ने जो कटुवचन सुनने के योग्य नहीं थीं, उन सीता से अप्रिय तथा कठोर वचन कहना आरम्भ किया— सीते! रावण का अन्तःपुर समस्त प्राणियों के लिये मनोरम है। वहाँ बहुमूल्य शय्याएँ बिछी रहती हैं। उस अन्तःपुर में तुम्हारा निवास हो, इसके लिये तुम क्यों नहीं अनुमति देतीं? तुम मानुषी हो, इसलिये मनुष्य की भार्या का जो पद है, उसी को तुम अधिक महत्त्व देती हो; किंतु अब तुम राम की ओर से अपना मन हटा लो, अन्यथा कदापि जीवित नहीं रहोगी। तुम त्रिलोकी के ऐश्वर्य को भोगने वाले राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाकर आनन्दपूर्वक विहार करो।अनिन्द्य सुन्दरि! तुम मानवी हो, इसीलिये मनुष्य जातीय राम को ही चाहती हो; परंतु राम इस समय राज्य से भ्रष्ट हैं। उनका कोई मनोरथ सफल नहीं होता है तथा वे सदा व्याकुल रहते हैं। 

राक्षसियों की ये बातें सुनकर कमलनयनी सीता ने आँसूभरे नेत्रों से उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा – तुम सब मिलकर मुझसे जो यह लोकविरुद्ध प्रस्ताव कर रही हो, तुम्हारा यह पापपूर्ण वचन मेरे हृदय में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहर पाता है। एक मानवकन्या किसी राक्षस की भार्या नहीं हो सकती। तुम सब लोग भले ही मुझे खा जाओ; किंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकती। मेरे पति दीन हों अथवा राज्यहीन–वे ही मेरे स्वामी हैं, वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हीं में अनुरक्त हूँ और रहूँगी। जैसे सुवर्चला सूर्य में अनुरक्त रहती हैं। जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में उपस्थित होती हैं, जैसे देवी अरुन्धती महर्षि वसिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमा में, लोपामुद्रा अगस्त्य में, सुकन्या च्यवन में, सावित्री सत्यवान् में, श्रीमती कपिल में, मदयन्ती सौदास में, केशिनी सगर में तथा भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषधनरेश नल में अनुराग रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीराम में अनुरक्त हूँ।

सीता जी सिर्फ़  श्रीराम में मंत्रमुग्ध, आसक्त और प्रेम में बंधी हुई थी। 

सीता की बात सुनकर राक्षसियों के क्रोध की सीमा न रही। वे रावण की आज्ञा के अनुसार कठोर वचनों द्वारा उन्हें धमकाने लगीं। अशोकवृक्ष में चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमान् जी सीता को फटकारती हुई राक्षसियों की बातें सुनते रहे। वे सब राक्षसियाँ कुपित हो वहाँ काँपती हुई सीता पर चारों ओर से टूट पड़ीं और अपने लम्बे एवं चमकीले ओठों को बारम्बार चाटने लगीं। उनका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे सब-की-सब तुरंत हाथों में फर से लेकर बोल उठीं—’यह राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाने योग्य है ही नहीं। उस भयानक राक्षसियों के बारम्बार डाँटने और धमकाने पर सर्वांगसुन्दरी कल्याणी सीता अपने आँसू पोंछती हुई उसी अशोकवृक्ष के नीचे चली आयीं (जिसके ऊपर हनुमान जी छिपे बैठे थे)। विशाललोचना वैदेही शोक-सागर में डूबी हुई थीं। इसलिये वहाँ चुपचाप बैठ गयीं। किंतु उन राक्षसियों ने वहाँ भी आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया। वे बहुत ही दुर्बल हो गयी थीं। उनके मुख पर दीनता छा रही थी और उन्होंने मलिन वस्त्र पहन रखा था। उस अवस्था में उन जनकनन्दिनी को चारों ओर खड़ी हुई भयानक राक्षसियों ने फिर धमकाना आरम्भ किया। तदनन्तर विनता नामकी राक्षसी आगे बढ़ी। वह देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी देह क्रोध की सजीव प्रतिमा जान पड़ती थी। उस विकराल राक्षसी के पेट भीतर की ओर धंसे हुए थे। वह बोली- सीते! तूने अपने पति के प्रति जितना स्नेह दिखाया है, इतना ही बहुत है। भद्रे ! अति करना तो सब जगह दुःख का ही कारण होता है । मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा भला हो। मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि तुमने मानवोचित शिष्टाचार का अच्छी तरह पालन किया है। अब मैं भी तुम्हारे हित के लिये जो बात कहती हूँ, उसपर ध्यान दो उसका शीघ्र पालन करो। समस्त राक्षसोंका भरण-पोषण करनेवाले महाराज रावणको तुम अपना पति स्वीकार कर लो। वे देवराज इन्द्रके समान बड़े पराक्रमी तथा रूपवान् हैं।दीन-हीन मनुष्य राम का परित्याग करके सबसे प्रिय वचन बोलने वाले, उदार और त्यागी रावण का आश्रय लो।विदेहराजकुमारी! तुम आज से  समस्त लोकों की स्वामिनी बन जाओ और दिव्य अंगराग तथा दिव्य आभूषण धारण करो। शोभने! जैसे अग्नि की प्रिय पत्नी स्वाहा और इन्द्र की प्राणवल्लभा शची हैं, उसी प्रकार तुम रावण की प्रेयसी बन जाओ। विदेहकुमारी! श्रीराम तो दीन हैं। उनकी आयु भी अब समाप्त हो चली है। उनसे तुम्हें क्या मिलेगा!

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