सचेतन:बुद्धचरितम्-7 अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation):

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सचेतन:बुद्धचरितम्-7 अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation):

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“बुद्धचरितम्” के सर्गों का वर्णन गौतम बुद्ध के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं और घटनाओं को सुंदर काव्यात्मक भाषा में प्रस्तुत करता है। बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। हमने अबतक भगवत्प्रसूति (The Divine Birth): इस सर्ग में बुद्ध के दिव्य जन्म का वर्णन सुना, जिसमें उनकी माता माया का उन्हें लुम्बिनी वन में जन्म देना शामिल है।, अन्तःपुरविहार (Life in the Palace): इसमें बुद्ध के राजमहल में बिताए गए युवावस्था के दिनों का वर्णन सुना, जहाँ उनकी जीवनशैली और विलासिता का चित्रण होता है।
संवेगोत्पत्तिः (The Genesis of Disenchantment): बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन सुना, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया। और।
स्त्रीविघातन (Renunciation of Women): यह सर्ग बुद्ध की महल की स्त्रियों और उनके प्रति उनकी अनासक्ति का वर्णन सुना।
आज हम। अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation): बुद्ध के महल छोड़ने और संन्यासी जीवन को अपनाने का वर्णन सुनेगे
एक बार राजकुमार सिद्धार्थ के मन में वैराग्य का भाव इतना प्रबल हो उठा कि वे राजा की आज्ञा लेकर पुनः वन की ओर निकल पड़े। उनके मन में वन की सुंदरता और प्रकृति के अद्भुत गुणों को देखने की उत्कंठा थी। वे दूर-दूर तक फैले हरे-भरे वन में गहराई तक गए।

वहां पहुंचकर, राजकुमार ने देखा कि किसान हल से जमीन जोत रहे थे। हल चलने से जमीन के तृण और कुशायें उखड़ गई थीं, और उसमें छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े मरकर बिखर गए थे। इस दृश्य को देखकर राजकुमार सिद्धार्थ का हृदय द्रवित हो उठा। उन्हें अपने परिजनों की याद आ गई, और उन्होंने महसूस किया मानो उनका स्वजन का बध हो गया हो।

इस दुखदायी दृश्य से उनके मन में विश्व के जन्म और मृत्यु के चक्र पर गहन चिंतन शुरू हो गया। उन्होंने सोचा कि यह जीवन कितना नश्वर है और हर प्राणी कितना असहाय है। इसी चिंतन में डूबे हुए राजकुमार सिद्धार्थ ने उस हरित तृण युक्त सुंदर और पवित्र भूमि पर ध्यान लगाना शुरू किया। वे विश्व के इस जन्म-मृत्यु के रहस्य को समझने के लिए गहरे ध्यान में लीन हो गए और मन की एकाग्रता के मार्ग पर चल पड़े।

बगीचे में चिंतन वे कर ही रहे थे की, तभी एक अनोखी घटना घटी। उनके सामने एक भिक्षु वेष में एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसे किसी ने नहीं देखा था। राजकुमार ने उत्सुकता से उससे पूछा, “कहो, तुम कौन हो?”

भिक्षु ने उत्तर दिया, “नरश्रेष्ठ! मैं जन्म और मृत्यु के भय से व्यथित होकर संन्यासी बना हूँ और मोक्ष की खोज में हूँ। मैं इस नश्वर जगत में एक अविनाशी, कल्याणमय पद की तलाश कर रहा हूँ। मैंने विषयों के राग-द्वेष से मुक्त होकर निज और पराये में समान बुद्धि को अपनाया है। जहां कहीं भी, जो कुछ भी मिल जाता है, उसे ग्रहण कर लेता हूँ और बिना किसी आशा के घूमता रहता हूँ।”

यह कहकर वह भिक्षु अचानक आकाश में उड़ गया। यह देखकर राजकुमार अत्यंत प्रसन्न और आश्चर्यचकित हुए। उस भिक्षु की बातें और उसका अद्भुत आकाश में उड़ना, यह सब कुछ राजकुमार के मन में गहराई से बैठ गया। उन्होंने महसूस किया कि यह भिक्षु कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक देव विशेष था, जिसे उनकी स्मृति जगाने के लिए भेजा गया था।

इस घटना से प्रेरित होकर, राजकुमार ने फिर से अपने घर की ओर प्रस्थान किया, लेकिन उनके मन में अब एक नई चेतना जागृत हो चुकी थी। उन्होंने ठान लिया कि वे भी इस भौतिक जगत के मोह-माया से मुक्त होकर उसी अविनाशी पद की खोज में निकलेंगे, जिसकी खोज में वह भिक्षु निकला था।

राजकुमार सिद्धार्थ धीरे-धीरे जीवन की गहराइयों को समझने लगे थे। उन्होंने देखा कि संसार में सब कुछ नश्वर है—यौवन, वैभव, प्रेम, और जीवन स्वयं भी। वृद्धावस्था, बीमारी, और मृत्यु के दर्शन ने उनके मन में वैराग्य की भावना जगा दी थी। वे अब इस सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की खोज में निकलना चाहते थे।

वे अपने महल लौटे और सीधे अपने पिता, राजा शुद्धोधन के पास गए। उन्होंने आदरपूर्वक प्रणाम कर कहा, “हे पिताश्री! मुझे अनुमति दें कि मैं संन्यास ग्रहण करूं। मैं सत्य और मोक्ष की खोज में जाना चाहता हूँ, क्योंकि यह संसार नश्वर है, और एक दिन हमें अपने प्रियजनों से वियोग अवश्य होगा।”

राजा शुद्धोधन यह सुनकर कांप उठे। उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं। वे जानते थे कि सिद्धार्थ साधारण बालक नहीं थे, उनके विचार गहरे थे, परंतु पुत्र को इस तरह संसार त्यागते देखना उनके लिए असहनीय था।

राजा ने करुण स्वर में कहा, “वत्स! अभी तुम्हारे लिए धर्म का समय नहीं आया है। यह युवा अवस्था आनंद और उत्सव के लिए होती है। धर्म का पालन वृद्धावस्था में किया जाता है, जब मन स्थिर हो जाता है। अभी तुम्हें इस राजसी जीवन का आनंद लेना चाहिए। सुख, धन, और परिवार के साथ जीवन व्यतीत करो।”

लेकिन सिद्धार्थ का मन अब सांसारिक सुखों में नहीं था। उन्होंने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हे राजन! यदि आप मेरी चार इच्छाएँ पूरी कर सकें, तो मैं संन्यास नहीं लूंगा।”आगले सत्र में बात करेंगे की राजा ने आश्चर्य से जी पूछा, “वत्स! कौन-सी चार इच्छाएँ? उसके बारे में

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