“क्या आपने कभी सपना देखा है…और सपने में ही रोए हैं, डर गए हैं, खुश हो गए हैं? उस समय सपना बिल्कुल सच लगता है।लेकिन जागने के बाद हम कहते हैं—‘अरे, यह तो बस सपना था।’ शंकराचार्य कहते हैं—संसार भी कुछ ऐसा ही है।” संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः। स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्भवेत्॥६॥ सरल अर्थ “यह […]
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सचेतन- 05: आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान शुद्ध करता है… और फिर स्वयं विलीन हो जाता है”
“क्या आपने कभी महसूस किया है—कि भीतर कुछ धुँधला-सा है?जैसे मन साफ़ होना चाहता है…लेकिन कोई परत, कोई मैल, हट नहीं रही? शंकराचार्य कहते हैं—यह मैल अज्ञान का है।और इसे हटाने का एक ही उपाय है—ज्ञान का अभ्यास।” अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्विनिर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत्॥५॥ सरल अर्थ “अज्ञान से मलिन हुआ जीवनिरंतर ज्ञान-अभ्यास से […]
सचेतन- 04: आत्मबोध की यात्रा – “मैं सीमित नहीं हूँ— यह सिर्फ़ भ्रम है”
“क्या आपको कभी ऐसा लगता है…कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं अकेला हूँ, मैं अधूरा हूँ? जैसे जीवन में कुछ ‘कम’ पड़ रहा हो…जैसे मैं ‘सीमित’ हूँ… शंकराचार्य कहते हैं—यह सच नहीं है।यह सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा है।” अवच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेंऽशुमानिव॥४॥ सरल अर्थ “अज्ञान के कारण आत्मा सीमित-सी लगती है।जब अज्ञान […]
सचेतन- 03: आत्मबोध की यात्रा – “कर्म नहीं, ज्ञान ही अज्ञान को मिटाता है”
“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं…काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है—क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंइसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म—यानी कोई भी क्रिया,अज्ञान को नहीं मिटा सकती,क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं […]
सचेतन- 02: आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान ही मोक्ष का सीधा साधन है”
“हम जीवन भर बहुत कुछ करते रहते हैं…पूजा, जाप, यात्रा, योग, ध्यान… लेकिन एक सवाल चुपचाप खड़ा रहता है—क्या इससे सचमुच मुक्ति मिलती है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंबहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्। पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं विना मोक्षो न सिध्यति॥ “जैसे भोजन पकाने के लिएसीधे तौर पर आग ही चाहिए—वैसे ही मोक्ष के लिए […]
सचेतन- 01: आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत
आत्मबोध — स्वयं को जानने की शुरुआत “क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है—मैं कौन हूँ? नाम… पद… पहचान…ये सब तो बाहर के शब्द हैं। लेकिन जो भीतर महसूस करता है—वह कौन है?” भीतर की पुकार “हर इंसान के जीवन मेंएक ऐसा क्षण आता हैजब वह रुकता है। सब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा […]
सचेतन- 53 वेदांत सूत्र: मुमुक्षुत्व — भीतर की पुकार
“क्या आपको कभी ऐसा लगा है…कि बाहर सब ठीक है,सब है—फिर भी दिल के अंदरएक खालीपन है? एक कमी…जिसका नाम आप नहीं जानते। वेदांत कहता है—इस खालीपन का नाम है मुमुक्षुत्व…मुक्त होने की पुकार…सच्ची शांति को छू लेने की प्यास।” “दोस्तों…हम सबके जीवन में एक समय आता हैजब मन थक जाता है। थकान शरीर की […]
सचेतन- 52 वेदांत सूत्र: समाधान — मन की स्थिरता
“क्या आपका मन एक जगह नहीं टिकता?और क्या इसी वजह से शांति बार-बार टूट जाती है?Vedanta कहता है — मन को स्थिर करना ही समाधान है।” “आपने गौर किया है?मन कहीं और होता है…और हम किसी और काम में।यही अस्थिरता हमारा सबसे बड़ा दर्द है।” “षट्सम्पत्ति का आख़िरी गुण ‘समाधान’ —मन को एक जगह स्थिर […]
सचेतन- 51 वेदांत सूत्र: श्रद्धा — विश्वास जो रास्ता दिखाता है
“ज़िंदगी में रास्ता नहीं दिखता, डर लगता है, मन उलझा रहता है…क्यों?क्योंकि जहाँ श्रद्धा कम होती है, वहाँ अंधकार ज़्यादा होता है।” “हम हर चीज़ का प्रूफ चाहते हैं—लेकिन क्या आपने ध्यान दिया?सबसे बड़े फैसले हम प्रूफ से नहीं, विश्वास से करते हैं।” “Vedanta कहता है—‘श्रद्धा के बिना ज्ञान भी फल नहीं देता।’आज हम समझेंगे […]
सचेतन- 50 वेदांत सूत्र: तितिक्षा — सुख–दुःख को शांति से सहने की सरल कला
“जीवन में सब कुछ मिलता है—कभी सुख, कभी दुख।कभी सम्मान, कभी अपमान।कभी गर्मी, कभी ठंड। ये सब बदलते रहते हैं…लेकिन एक चीज़ हमेशा आपके हाथ में है—आपका मन कितना शांत रहता है। Vedanta इस शांति को तितिक्षा कहता है—यानि सहनशीलता, परिस्थितियों को शांत मन से संभालने की कला।” छोटी-सी कहानी एक व्यक्ति रोज़ ऑफिस जाते […]
