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सचेतन — 18- दस इन्द्रियाँ — तुम्हें पकड़ रही हैं या तुम उन्हें चलाते हो?

नमस्कार… आज की बात बहुत गहरी है। हमारे पास 10 इन्द्रियाँ हैं। और हर एक… आपको किसी न किसी तरफ खींच रहा है। सवाल यह है — क्या आप इन्हें चला रहे हैं? या ये आपको चला रही हैं? चलिए… समझते हैं। राज का ध्यान  राज रोज़ सुबह 5 बजे meditation करता था। शांत कमरा… […]

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सचेतन – 18 विवेकचूडामणि — जिस शरीर के लिए पूरी जिंदगी भाग रहे हो… वह आखिर है क्या?”

नमस्कार… एक सवाल… अगर आपका शरीर बदल जाए… चेहरा बदल जाए… उम्र बढ़ जाए… तो क्या “आप” बदल जाएंगे? या सिर्फ शरीर बदलेगा? चलिए… आज की पहली कहानी सुनते हैं। नेहा और झुर्रियाँ  नेहा 42 साल की थी। बहुत सुंदर थी। हमेशा से सुंदर रही थी। स्कूल में सबसे सुंदर लड़की। College में सबके crush। […]

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सचेतन – 17 विवेकचूडामणि — “जिसे तुम सहारा समझ रहे हो… वही तुम्हें डुबो भी सकता है” 

नमस्कार… आज का सवाल बहुत गहरा है। जिस चीज़ को आप अपनी खुशी समझ रहे हैं… क्या वही धीरे-धीरे आपकी सबसे बड़ी चिंता बन रही है? जिससे सहारा चाहिए… क्या वहीं डर आ रहा है? चलिए… एक कहानी से समझते हैं। राघव का Career (professional, फिर emotional kahani hi) राघव एक successful आदमी था। Big […]

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सचेतन – 16विवेकचूडामणि —”जो तुम्हें अच्छा लग रहा है… वही तुम्हें बाँध भी रहा है” 

नमस्कार… आज का सवाल बहुत अलग है। जो चीज़ें हमें सबसे ज़्यादा खुशी देती हैं… क्या वही हमें सबसे ज़्यादा कमजोर भी बना रही हैं? फोन… Reels… स्वाद… तारीफ़… Likes… चलिए… एक कहानी से समझते हैं। अमित और उसका फोन  (relatable, थोड़ा frustrating हैं) अमित एक normal लड़का था। Office जाता… काम करता… घर आता। […]

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सचेतन- 38 –आत्मबोध – साधना से साक्षात्कार की ओर 

“ध्यान कोई तकनीक नहीं, एक परिपक्व स्थिति है” क्या आपने कभी यह महसूस किया है किआप ध्यान करना चाहते हैं,लेकिन मन बैठने को तैयार ही नहीं होता? शरीर बैठ जाता है,आँखें बंद हो जाती हैं,पर मन बाहर ही भटकता रहता है। आत्मबोध में आज का यह विचारहमें एक बहुत स्पष्ट बात सिखाता है— 👉 ध्यान […]

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सचेतन- 37 –आत्मबोध – “निरंतर अभ्यास ही अज्ञान की बीमारी की औषधि है”

क्या आपने कभी महसूस किया है किआप सही बात समझते हैं…फिर भी वही पुरानी बेचैनी,वही प्रतिक्रिया,वही डर लौट आता है? हम कहते हैं—“मैं आत्मा हूँ” “मैं ब्रह्म हूँ” लेकिन ज़रा-सी परिस्थिति बदलते हीहम फिर वही पुराने “मैं” बन जाते हैं। आत्मबोध में आज का विचारयही प्रश्न उठाता है—समझ आ जाने के बाद भी मन अशांत […]

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सचेतन- 36 –आत्मबोध –  “मैं कौन हूँ?”

हम जीवन भर एक ही प्रश्न से जूझते रहते हैं—“मैं कौन हूँ?” कभी हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं,कभी मन,कभी रिश्ते,कभी सफलता या असफलता। लेकिन आत्मबोध का यह अंतिम श्लोकहमें सीधा, स्पष्ट और निर्भय उत्तर देता है— “तुम वही हो, जिसे तुम खोज रहे थे।” शंकराचार्य कहते हैं— मैं नित्य शुद्ध हूँ, सदा मुक्त […]

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सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”

क्या आपने कभी ध्यान दिया है— आपके जीवन मेंलोग आते हैं, जाते हैं…परिस्थितियाँ बदलती हैं…सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं… लेकिन फिर भीआपके भीतर कहींकुछ ऐसा हैजो इन सबके बीचबिलकुल शांत बना रहता है? आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे कीयही मौन सत्य की ओर इशारा करता है— “मैं आकाश के समान हूँ।” शंकराचार्य […]

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सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात क्या आपने कभी सोचा है—इतना ध्यान करने के बाद भीमन क्यों शांत नहीं होता? क्यों भीतर कहीं यह भावना बनी रहती है—“अभी कुछ और करना बाकी है…अभी मुक्ति दूर है…” आत्मबोध का आज का विचारयहीं एक बहुत गहरी बात कहता है— मुक्ति पाने की ज़रूरत नहीं […]

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सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं

क्या आपने कभी महसूस किया है किमन लगातार बेचैन रहता है? कभी चिंता,कभी डर,कभी किसी से लगाव,तो कभी किसी से चिढ़। और फिर हम कहते हैं—“मैं बहुत परेशान हूँ।” लेकिन ज़रा ठहरिए— अगर यह परेशानीआपकी नहीं,आपके मन की हो तो? आत्मबोध का श्लोक 33यही क्रांतिकारी बात कहता है— आप मन नहीं हैं, और इसलिए दुख, […]