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सचेतन- 10: आत्मबोध की यात्रा – “उपाधियाँ बदलती हैं— मैं नहीं”

“कभी आपने सोचा है—हम इतने अलग क्यों दिखते हैं? मेरा शरीर अलग, आपका अलग…मेरी उम्र अलग, आपकी अलग…मेरी कहानी अलग, आपकी अलग… लेकिन क्या मैं सच में अलग हूँ?या अलग-अलग सिर्फ़ ‘कवर’ हैं?” यथाकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः। तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे केवलो भवेत्॥१०॥ सरल अर्थ “जैसे आकाश एक होते हुए भीअलग-अलग घड़ों/कमरों (उपाधियों) के कारणअनेक-सा प्रतीत होता […]

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सचेतन- 09:  आत्मबोध की यात्रा – “सब एक ही सत्य से बने हैं”

“कभी आपने सोचा है—हम सब इतने अलग क्यों दिखते हैं? कोई अमीर, कोई गरीब…कोई मनुष्य, कोई पशु…कोई देव, कोई साधारण… लेकिन अगर भीतर से देखा जाए—तो क्या हम सच में अलग हैं?” सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः। व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत्॥९॥ सरल अर्थ “सच्चिदानंद स्वरूप,सर्वत्र व्याप्त,नित्य ब्रह्म (विष्णु) मेंयह सारी विविध सृष्टिकल्पना से प्रकट हुई […]

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सचेतन- 08:  आत्मबोध की यात्रा – “जगत बुदबुदों जैसा है”

“कभी आपने पानी में उठते बुदबुदे देखे हैं?वे अचानक पैदा होते हैं…कुछ देर टिकते हैं…और फिर बिना कोई निशान छोड़ेखुद ही विलीन हो जाते हैं। शंकराचार्य कहते हैं—हमारा जीवन और यह पूरा जगत भी कुछ ऐसा ही है।” उपादानेऽखिलाधारे जगन्ति परमेश्वरे। सर्गस्थितिलयान्यान्ति बुद्बुदानीव वारिणि॥८॥ सरल अर्थ “यह सम्पूर्ण जगतउस परमेश्वर में उत्पन्न होता है,उसी में […]

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सचेतन- 07:  आत्मबोध की यात्रा -“जब तक ब्रह्म नहीं जाना— जगत सत्य लगता है”

“कभी आपने दूर से चमकती हुई कोई चीज़ देखी है…और लगा हो— यह तो चाँदी है? आप पास गए…और पता चला— वह तो सीप थी।चाँदी नहीं। शंकराचार्य कहते हैं—जगत का ‘सत्य’ भी कुछ ऐसा ही है।” तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम्॥७॥ “यह जगत तब तक सत्य जैसा प्रतीत होता है,जब तक ब्रह्म— […]

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सचेतन- 06:  आत्मबोध की यात्रा -“संसार: एक जागता हुआ स्वप्न है”

“क्या आपने कभी सपना देखा है…और सपने में ही रोए हैं, डर गए हैं, खुश हो गए हैं? उस समय सपना बिल्कुल सच लगता है।लेकिन जागने के बाद हम कहते हैं—‘अरे, यह तो बस सपना था।’ शंकराचार्य कहते हैं—संसार भी कुछ ऐसा ही है।” संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः। स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्भवेत्॥६॥ सरल अर्थ “यह […]

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सचेतन- 05:  आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान शुद्ध करता है… और फिर स्वयं विलीन हो जाता है”

“क्या आपने कभी महसूस किया है—कि भीतर कुछ धुँधला-सा है?जैसे मन साफ़ होना चाहता है…लेकिन कोई परत, कोई मैल, हट नहीं रही? शंकराचार्य कहते हैं—यह मैल अज्ञान का है।और इसे हटाने का एक ही उपाय है—ज्ञान का अभ्यास।” अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्विनिर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत्॥५॥ सरल अर्थ “अज्ञान से मलिन हुआ जीवनिरंतर ज्ञान-अभ्यास से […]

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सचेतन- 04:  आत्मबोध की यात्रा – “मैं सीमित नहीं हूँ— यह सिर्फ़ भ्रम है”

“क्या आपको कभी ऐसा लगता है…कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं अकेला हूँ, मैं अधूरा हूँ? जैसे जीवन में कुछ ‘कम’ पड़ रहा हो…जैसे मैं ‘सीमित’ हूँ… शंकराचार्य कहते हैं—यह सच नहीं है।यह सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा है।” अवच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेंऽशुमानिव॥४॥ सरल अर्थ “अज्ञान के कारण आत्मा सीमित-सी लगती है।जब अज्ञान […]

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सचेतन- 03:  आत्मबोध की यात्रा – “कर्म नहीं, ज्ञान ही अज्ञान को मिटाता है”

“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं…काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है—क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंइसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म—यानी कोई भी क्रिया,अज्ञान को नहीं मिटा सकती,क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं […]

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सचेतन- 02:  आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान ही मोक्ष का सीधा साधन है”

“हम जीवन भर बहुत कुछ करते रहते हैं…पूजा, जाप, यात्रा, योग, ध्यान… लेकिन एक सवाल चुपचाप खड़ा रहता है—क्या इससे सचमुच मुक्ति मिलती है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंबहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्। पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं विना मोक्षो न सिध्यति॥ “जैसे भोजन पकाने के लिएसीधे तौर पर आग ही चाहिए—वैसे ही मोक्ष के लिए […]

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सचेतन- 01:  आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत

आत्मबोध — स्वयं को जानने की शुरुआत “क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है—मैं कौन हूँ? नाम… पद… पहचान…ये सब तो बाहर के शब्द हैं। लेकिन जो भीतर महसूस करता है—वह कौन है?” भीतर की पुकार  “हर इंसान के जीवन मेंएक ऐसा क्षण आता हैजब वह रुकता है। सब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा […]