हमने बात किया की –अन्नमय कोश – “अन्नं ब्रह्मेति” शरीर अन्न से बना है। भोजन से पोषण होता है, उसी से हड्डी-मांस बनता है। शरीर बिना भोजन टिक नहीं सकता। इसलिए अन्न को ब्रह्म कहा गया।प्राणमय कोश – “प्राणो ब्रह्मेति”, प्राण (श्वास और ऊर्जा) ही जीवन का आधार है। इसमें पाँच प्राण काम करते हैं: […]
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सचेतन- 28: तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्दमिमांसा का रहस्य-2
उपनिषद् का रहस्य सरल उपमा में कल्पना करो — लेकिन चाहे दीपक कितने भी बढ़ जाएँ, वे सूर्य के प्रकाश के सामने तुच्छ हैं।दीपक = सीमित सुख।सूर्य = ब्रह्मानन्द (अनंत सुख)। भौतिक और दैवी सुख — इंद्रिय और मन पर आधारित, सीमित और नश्वर।ब्रह्मानन्द — आत्मा और ब्रह्म की एकता से उत्पन्न, असीम और शाश्वत। […]
सचेतन- 27: तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्दमिमांसा का रहस्य
तैत्तिरीयोपनिषद् का लक्ष्य यह दिखाना है कि — मनुष्य जिसे “सुख” समझता है (धन, शरीर, पद, कला, सौंदर्य, शक्ति आदि), वह सब सीमित और क्षणभंगुर है। अगर उस सुख को धीरे-धीरे 100–100 गुना बढ़ाते चलें, तब भी उसका एक अंत है।लेकिन आत्मा का आनंद (ब्रह्मानन्द) — उसके परे है, और अनंत है।भौतिक और दैवी सुख […]
सचेतन- 26:तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्द की सीढ़ियाँ (आनन्दमिमांसा)
‘मीमांसा’ शब्द का अर्थ है गंभीर मनन, विचार-विमर्श, या किसी विषय के मूल तत्त्वों का गहन ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला विवेचन। मीमांसा दर्शन का मुख्य उद्देश्य धर्म के सार को समझना और मानव कर्तव्य को स्पष्ट करना है। 1. मानव-सुख (Manuṣyānanda) कल्पना करो कि एक 25 वर्ष का युवा है — […]
सचेतन- 25:तैत्तिरीय उपनिषद्: परम आनन्द ही ब्रह्म है
“आनन्दो ब्रह्मेति” ✨इसका अर्थ है — परम आनन्द ही ब्रह्म है। तैत्तिरीयोपनिषद् का भाव कि साधक जब अन्न (शरीर), प्राण (जीवन-शक्ति), मन (विचार-भावना) और विज्ञान (विवेक-ज्ञान) की सीमाओं को पार कर लेता है, तब वह पहुँचता है आनन्दमय कोश में।यहीं अनुभव होता है कि — यही अवस्था है — आनन्दो ब्रह्मेति। क्यों कहा गया “आनन्द […]
सचेतन- 24: तैत्तिरीय उपनिषद्:रथ रूपक
“रथ रूपक”। यह आत्मा और शरीर के संबंध को बहुत सरल और प्रभावी तरीके से समझाता है। आत्मा क्या है? आत्मा हमारी असली पहचान है। यह अमर, शाश्वत और अविनाशी है। यह न दिखाई देती है, न ही छूई जा सकती है, लेकिन हर प्राणी में इसका अस्तित्व है। आत्मा ही वह चेतना है, जिससे […]
सचेतन- 19:तैत्तिरीय उपनिषद्: ज्ञान और विवेक ही ब्रह्म है
“विज्ञानं ब्रह्मेति” = ज्ञान और विवेक ही ब्रह्म है। विज्ञान यहाँ केवल भौतिक विज्ञान (Science) नहीं है, बल्कि आत्म-बोध और विवेकपूर्ण ज्ञान है।यह वह स्तर है जहाँ साधक केवल मन और भावना (मनोमय कोश) से ऊपर उठकर सही-गलत को पहचानने वाली बुद्धि (विज्ञानमय कोश) तक पहुँचता है।यही विवेक उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है।क्यों […]
सचेतन- 18: तैत्तिरीय उपनिषद्: मन ही ब्रह्म है
सचेतन- 18: तैत्तिरीय उपनिषद्: मन ही ब्रह्म है “मनो ब्रह्मेति” का अर्थ है —मन ही ब्रह्म है, क्योंकि मन ही वह केंद्र है जहाँ विचार, भावना, इच्छा और संकल्प जन्म लेते हैं। मन क्यों ब्रह्म है? मन केवल सोचने का यंत्र नहीं है, बल्कि चेतना का दर्पण है। हर अनुभव (सुख, दुख, प्रेम, क्रोध, शांति) […]
सचेतन- 15:तैत्तिरीय उपनिषद्: ब्रह्मानंदवल्ली-तप, सत्य, और आत्म-संयम
ब्रह्मानंदवल्ली — उस साधक को ब्रह्मानंद (ब्रह्म का आनंद) की अनुभूति तक ले जाती है। तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्म को केवल जानने की बात नहीं करता, बल्कि ब्रह्म “होने” की बात करता है। और इसका माध्यम है — तप, सत्य, और आत्म-संयम। तैत्तिरीयोपनिषद् में ब्रह्म केवल एक ज्ञान का विषय नहीं है कि हम उसे “जान” लें, […]
सचेतन- 13:तैत्तिरीय उपनिषद्: शिक्षावल्ली -शुद्ध उच्चारण क्यों आवश्यक है?
शिक्षावल्ली तैत्तिरीय उपनिषद् (यजुर्वेद की शाखा) का प्रथम भाग है। “वल्ली” का अर्थ है — लता या शाखा। इसलिए शिक्षावल्ली = वह शाखा जिसमें शिक्षा (उच्चारण, स्वर, लय और पाठ की शुद्धि) के विषय में ज्ञान दिया गया है। शिक्षा में उच्चारण, स्वर, मात्रा और बल की शुद्ध परंपरा।इसके छः अंग (तत्त्व) हैं शिष्य को […]
