सचेतन — 41 “पाँच परतें — जो आपको आपसे छिपाए हुए हैं”

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सचेतन — 41 “पाँच परतें — जो आपको आपसे छिपाए हुए हैं”

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नमस्कार।

पिछली बार आपने सीखा — विवेक की तलवार क्या है।

आज उस तलवार को चलाने का समय है।

लेकिन चलानी कहाँ है?

उन पाँच परतों पर, जो आपकी चेतना को ढके हुए हैं।

शास्त्र इन्हें कहते हैं — पंचकोश। यानी पाँच परतें। पाँच पर्दे।

आज हम एक-एक पर्दा हटाएँगे।

और देखेंगे कि पीछे कौन छिपा है।

एक सुंदर उदाहरण — बावड़ी

सोचिए।

एक पुरानी बावड़ी है। उसमें पानी है — बिल्कुल साफ़, बिल्कुल मीठा।

लेकिन पानी के ऊपर काई की मोटी परत जमी है।

ऊपर से देखो, तो पानी दिखता ही नहीं।

सिर्फ़ हरी काई दिखती है।

अब सवाल — क्या पानी गंदा हो गया?

नहीं। पानी तो साफ़ ही है।

बस ढका हुआ है।

काई हटाइए… और साफ़ पानी सामने।

वैसे ही आपकी चेतना है।

चेतना हमेशा शुद्ध है। साफ़ है।

बस उस पर पाँच परतें जमी हैं।

परतें हटाइए… और चेतना सामने।

पाँच परतें कौन सी हैं?

बहुत आसान भाषा में समझिए।

पहली परत — अन्नमय कोश। यानी यह शरीर। जो अन्न से, भोजन से बना है। जो खाते हैं, उसी से यह शरीर बनता है।

दूसरी परत — प्राणमय कोश। यानी प्राण। साँस। जीवन की शक्ति। जो शरीर को जीवित रखती है।

तीसरी परत — मनोमय कोश। यानी मन। विचार। भावनाएँ। सुख-दुख, राग-द्वेष — सब यहाँ।

चौथी परत — विज्ञानमय कोश। यानी बुद्धि। जो सोचती है, समझती है, फ़ैसले करती है।

पाँचवीं परत — आनंदमय कोश। यानी गहरी शांति। गहरी नींद में जो सुख मिलता है — वह।

संजय की खोज

संजय ने एक दिन ठान लिया —

“आज मैं पता लगाऊँगा कि मैं कौन हूँ।”

उसने ध्यान से देखना शुरू किया।

पहले शरीर को देखा।

“यह शरीर तो रोज़ बदलता है। बचपन में छोटा था, अब बड़ा है। कल बूढ़ा होगा।”

“जो बदलता रहे, वह मैं कैसे हो सकता हूँ?”

तो शरीर मैं नहीं।

फिर साँस को देखा।

“साँस भी बदलती है। कभी तेज़, कभी धीमी।”

तो प्राण भी मैं नहीं।

फिर मन को देखा।

“मन तो हर पल बदलता है। अभी खुश, अभी दुखी, अभी गुस्सा।”

“और मज़े की बात — मैं इन विचारों को देख रहा हूँ। विचार आते हैं, जाते हैं। मैं देखता रहता हूँ।”

तो मन भी मैं नहीं।

फिर बुद्धि को देखा।

“बुद्धि भी बदलती है। कल जो बात सही लगी, आज गलत लगती है।”

तो बुद्धि भी मैं नहीं।

फिर गहरी शांति को देखा।

“गहरी नींद का सुख भी आता-जाता है। सुबह उठो, तो चला जाता है।”

तो वह भी मैं नहीं।

और फिर…

संजय के मन में बिजली सी कौंधी।

“अरे! जो इन सबको देख रहा है…”

“जो शरीर को देखता है, मन को देखता है, बुद्धि को देखता है…”

“वह देखने वाला तो कभी नहीं बदला!”

“बचपन से आज तक — देखने वाला वही है।”

“वही मैं हूँ।”

प्रिया का डर

प्रिया ने यह बात सुनी, तो डर गई।

“अगर मैं शरीर नहीं, मन नहीं, बुद्धि नहीं… तो क्या मैं कुछ भी नहीं?”

“जैसे प्याज़ की परतें उतारो, तो अंत में कुछ नहीं बचता?”

लेकिन फिर उसे समझ आया।

बावड़ी की काई हटाने से पानी खत्म नहीं होता।

पानी तो और साफ़ दिखता है।

वैसे ही —

पाँच परतें हटाने से “मैं” खत्म नहीं होता।

बल्कि असली “मैं” पहली बार साफ़ दिखता है।

शुद्ध चेतना। जो सबको देखती है। जो कभी नहीं बदलती।

याद रखने की बात

एक छोटा सा सूत्र —

जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।

शरीर दिखता है — तो मैं नहीं। विचार दिखते हैं — तो मैं नहीं। सुख-दुख दिखते हैं — तो मैं नहीं।

और जो इन सबको देख रहा है?

वह मैं हूँ। वह आप हैं।

आज का अभ्यास

आज रात, सोने से पहले, दो मिनट के लिए आँखें बंद कीजिए।

और धीरे-धीरे अपने आप से कहिए —

“यह शरीर है। मैं इसे देख रहा हूँ। तो मैं शरीर नहीं।”

“ये विचार हैं। मैं इन्हें देख रहा हूँ। तो मैं विचार नहीं।”

“तो जो देख रहा है… वह कौन है?”

बस यहीं रुक जाइए।

जवाब शब्दों में नहीं आएगा।

शांति में आएगा।

आखिरी बात

पाँच परतें हैं।

शरीर। प्राण। मन। बुद्धि। शांति।

पाँचों बदलती हैं। पाँचों आती-जाती हैं।

आप वह हैं जो कभी नहीं बदलता।

विवेक की तलवार लीजिए।

एक-एक परत हटाइए।

“यह मैं नहीं। यह भी मैं नहीं।”

और जब सारी परतें हट जाएँगी…

तब बचेगा — शुद्ध जल जैसा शुद्ध “मैं”।

शुद्ध चेतना। सच्चा आनंद।

यह था सचेतन।

अपने आप को पहचानिए।

नमस्कार। 🙏

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