सचेतन — 42 “शरीर — देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं”

SACHETAN  > Atmbodh, Consciousness, Uncategorized, upnishad, vedant, vivekchudamani >  सचेतन — 42 “शरीर — देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं”

सचेतन — 42 “शरीर — देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं”

| | 0 Comments

नमस्कार।

पिछली बार आपने विचार सुना की  — “मैं अगर शरीर हूँ” — तो यही सोच सारे दुख की जड़ है।

आज एक कदम और गहरे चलते हैं।

आज हम यह देखेंगे —

शरीर आखिर है क्या?

और यह भी — आप शरीर क्यों नहीं हो सकते?

आज कोई कहानी-किस्सा नहीं, सीधी-सीधी समझ की बात।

लेकिन इतनी आसान, कि सुनते-सुनते ही बात बैठ जाएगी।

पहले देखिए — शरीर बना किससे है?

ज़रा सोचिए।

यह शरीर किन चीज़ों से बना है?

त्वचा। मांस। खून। हड्डियाँ। चर्बी। अंग।

और जो शरीर से रोज़ बाहर निकलता है — पसीना, मैल, और बाकी सब।

यानी शरीर क्या है?

इन सब चीज़ों का एक ढेर। एक जोड़।

और यह ढेर कैसा है?

रोज़ बदलता है। रोज़ पुराना होता है। एक दिन मिट्टी में मिल जाता है।

अब सवाल —

आप, जो सदा एक जैसे हैं, जो जानने वाले हैं —

क्या आप यह बदलता हुआ ढेर हो सकते हैं?

रुकिए। जवाब देने से पहले, एक घड़े की बात सुनिए।

घड़े का उदाहरण

सामने एक मिट्टी का घड़ा रखा है।

घड़े को आप देख सकते हैं। घड़े को आप छू सकते हैं।

लेकिन क्या घड़ा आपको देख सकता है?

नहीं।

घड़ा कुछ नहीं देखता। कुछ नहीं जानता।

घड़ा एक जड़ चीज़ है। बेजान।

अब ध्यान से सुनिए।

शरीर भी बिल्कुल घड़े जैसा है।

शरीर को देखा जा सकता है — आईने में, तस्वीर में। शरीर को छुआ जा सकता है। वैद्य शरीर की जाँच कर सकता है।

यानी शरीर एक देखी जाने वाली चीज़ है।

तो फिर सवाल उठता है —

देखने वाला कौन है?

घड़ा तो देख नहीं सकता। शरीर भी नहीं देख सकता।

जो देख रहा है, जान रहा है —

वह आप हैं। चेतना। जानने वाला।

शरीर चीज़ है। आप जानने वाले हैं।

दर्द किसे होता है?

कोई कहेगा — “लेकिन शरीर में दर्द तो होता है! तो शरीर ही तो मैं हूँ?”

ज़रा ध्यान से देखिए।

घड़े पर हाथ मारिए। क्या घड़े को दर्द होता है?

नहीं। क्योंकि घड़ा जड़ है। जानता ही नहीं।

अब आपके हाथ पर चोट लगे, तो दर्द होता है।

लेकिन दर्द जानता कौन है?

“मुझे दर्द हो रहा है” — यह जानने वाला कौन है?

मरे हुए शरीर को चोट लगे, तो कोई दर्द नहीं जानता।

यानी दर्द को जानने के लिए चेतना चाहिए।

जो जानता है, वह आप हैं। शरीर तो बस वह जगह है जहाँ चोट लगी।

शरीर चलता है, आप देखते हैं

एक और बात देखिए।

शरीर को कौन-कौन चलाता है?

भूख चलाती है — खाना पड़ता है। नींद चलाती है — सोना पड़ता है। बीमारी चलाती है — लेटना पड़ता है। बुढ़ापा चलाता है — झुकना पड़ता है।

यानी शरीर तो बेचारा चलाया जाता है।

और आप?

आप हर बात को जान रहे हैं।

“अभी भूख लगी है।” “अभी नींद आ रही है।” “अभी तबीयत ठीक नहीं।”

जो सब कुछ जान रहा है — वह चलाया नहीं जा रहा।

वह देख रहा है। साक्षी है। वही आप हैं।

तीन आसान प्रमाण

अब तीन छोटी-छोटी बातें। गिनकर सुनिए।

पहली बात — शरीर जन्म से पहले नहीं था।

अगर आप शरीर होते, तो जन्म से पहले आप भी नहीं होते। लेकिन जानने वाला तो सदा से है। तो आप शरीर नहीं।

दूसरी बात — शरीर हर पल बदल रहा है।

बचपन का शरीर कहाँ गया? बदल गया। जवानी का शरीर? वह भी बदल रहा है। लेकिन “मैं” — वह तो बचपन से आज तक वही है। बदलते शरीर को देखने वाला नहीं बदला। तो आप शरीर नहीं।

तीसरी बात — शरीर के अनगिनत हिस्से हैं।

सिर, हाथ, पैर, आँख, कान — गिनते जाइए। लेकिन “मैं” कितने हैं? एक। अनेक हिस्सों को जानने वाला एक ही है। तो आप शरीर नहीं।

वैद्य की समझ

एक वैद्य था।

ज़िंदगी भर शरीर की जाँच करता रहा।

हड्डियाँ देखीं। नसें देखीं। एक-एक अंग देखा।

और एक दिन, जाँच करते-करते, वह ठिठक गया।

“अरे… मैं तो यह सब देख रहा हूँ।”

“जो देखा जा रहा है — वह शरीर है।”

“और जो देख रहा है — वह मैं हूँ।”

“देखने वाला और देखी जाने वाली चीज़ — दोनों एक कैसे हो सकते हैं?”

उस दिन वैद्य को शरीर की सबसे बड़ी बात समझ आई —

शरीर एक अद्भुत रचना है। लेकिन रचना अलग है, जानने वाला अलग।

सबसे सुंदर उपमा

शरीर एक गाड़ी है।

बहुत अच्छी गाड़ी। इसकी देखभाल कीजिए। इसे साफ़ रखिए।

लेकिन याद रखिए —

गाड़ी अलग है, चलाने वाला अलग।

गाड़ी पुरानी हो जाती है। चलाने वाला वही रहता है।

आप गाड़ी नहीं हैं।

आप चलाने वाले हैं। जानने वाले हैं। चेतना हैं।

आज का अभ्यास

आज दिन में तीन बार, बस एक पल के लिए रुकिए।

और मन में कहिए —

“यह शरीर दिख रहा है — तो यह देखी जाने वाली चीज़ है।”

“और जो देख रहा है — वह मैं हूँ।”

बस। एक पल का अभ्यास।

लेकिन धीरे-धीरे यह एक पल आपकी पूरी सोच बदल देगा।

आखिरी बात

घड़ा देख नहीं सकता — आप देख सकते हैं। शरीर जान नहीं सकता — आप जानते हैं।

शरीर चीज़ है। आप जानने वाले हैं।

शरीर गाड़ी है। आप चलाने वाले हैं।

और जिस दिन यह बात दिल में बैठ गई —

उस दिन शरीर का सारा डर, सारी चिंता, हल्की होने लगेगी।

यह था सचेतन।

अपने आप को पहचानिए।

नमस्कार। 🙏

हैशटैग

#सचेतन, #विवेकचूड़ामणि, #चेतना, #आत्मा, #शरीर, #देह, #साक्षी, #आत्मज्ञान, #अध्यात्म, #मुक्ति, #हिंदी_पॉडकास्ट, #सत्संग, #शंकराचार्य, #सरल_हिंदी, #ज्ञान,

याद रखिए

✅ शरीर = देखी जाने वाली चीज़ (घड़े जैसी) ✅ आप = देखने वाले, जानने वाले (चेतना) ✅ गाड़ी अलग, चलाने वाला अलग

🙏 जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।

🙏 Body = Dead Object। Consciousness = Living Subject। तुम consciousness हो, body नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *