सचेतन — 45 “प्राणमय कोश — साँस भी ‘मैं’ नहीं”
नमस्कार।
पिछली कड़ी में हमने पहली परत हटाई।
अन्नमय कोश — यानी यह शरीर।
हमने समझा — शरीर देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं।
लेकिन अब कोई कहेगा —
“ठीक है, मैं शरीर नहीं। लेकिन शरीर में जो जान है, जो साँस चल रही है — वह तो मैं हूँ न?”
बहुत अच्छा सवाल।
आज इसी का जवाब।
आज हटाते हैं दूसरी परत — प्राणमय कोश।
यानी साँस की परत। जीवन-शक्ति की परत।
पहले समझिए — प्राणमय कोश है क्या?
बहुत आसान है।
शरीर के भीतर एक शक्ति है, जो सब कुछ चलाती है।
साँस चलती है — इसी से। खाना पचता है — इसी से। खून दौड़ता है — इसी से। हाथ-पैर काम करते हैं — इसी से।
शास्त्र कहता है —
यह प्राण, और काम करने वाले पाँच अंग — हाथ, पैर, वाणी वगैरह —
इन सबको मिलाकर बनती है दूसरी परत।
प्राणमय कोश।
यही शक्ति शरीर को चलाती है। इसी के दम पर शरीर सारे काम करता है।
बड़ी काम की चीज़ है।
लेकिन सवाल वही —
क्या यह “मैं” हूँ?
शास्त्र कहता है — नहीं।
क्यों? तीन बातों से समझिए।
पहली बात — प्राण तो हवा है
ज़रा देखिए, साँस है क्या?
हवा भीतर आई। हवा बाहर गई।
बस।
जो हवा बाहर है — वही भीतर आती है। जो भीतर है — वही बाहर जाती है।
यानी प्राण हवा का ही एक रूप है।
अब सोचिए —
क्या आप हवा हैं?
आँगन में हवा चलती है — क्या आप कहते हैं, “यह मैं चल रहा हूँ”?
नहीं न?
तो भीतर की हवा “मैं” कैसे हो गई?
जो बाहर की हवा मैं नहीं — वह भीतर आकर भी मैं नहीं।
दूसरी बात — लोहार की धौंकनी
एक गाँव में लोहार था।
उसके पास एक धौंकनी थी — चमड़े की वह थैली, जो आग में हवा फूँकती है।
धौंकनी दिन भर चलती।
फूँ… फूँ… फूँ…
हवा भीतर लेती, हवा बाहर छोड़ती।
एक दिन लोहार के बेटे ने पूछा —
“बाबा, यह धौंकनी दिन भर साँस लेती है। तो क्या यह ज़िंदा है? क्या इसे कुछ पता है?”
लोहार हँसा।
“अरे नहीं बेटा। धौंकनी को क्या पता?”
“इसे न आग का पता, न लोहे का। न अपने भले का, न बुरे का।”
“यह तो बस हवा लेती-छोड़ती है। जानती कुछ नहीं।”
अब ध्यान से सुनिए।
शास्त्र कहता है — प्राण भी धौंकनी जैसा है।
साँस भीतर आती है, बाहर जाती है।
लेकिन साँस को कुछ पता नहीं।
न अच्छे का, न बुरे का। न अपने का, न पराए का।
“यह मेरा हित है, यह मेरा नुकसान” — साँस यह कभी नहीं जानती।
और जो कुछ जानता ही नहीं —
वह जानने वाला “मैं” कैसे हो सकता है?
तीसरी बात — रीना की रात
रीना रात को सो गई।
गहरी नींद।
उसे कुछ पता नहीं — न घर का, न बिस्तर का, न अपने नाम का।
लेकिन बताइए — क्या उसकी साँस रुक गई?
नहीं।
साँस पूरी रात चलती रही। खाना पचता रहा। खून दौड़ता रहा।
रीना से पूछकर? उसकी आज्ञा लेकर?
नहीं। अपने आप।
सुबह रीना उठी और बोली —
“वाह! कितनी अच्छी नींद आई।”
अब ज़रा रुकिए। यहाँ एक गहरी बात छिपी है।
रात भर साँस चली — पर साँस को पता नहीं था।
फिर “अच्छी नींद आई” — यह जाना किसने?
साँस ने? नहीं।
जानने वाला कोई और है।
जो नींद में भी था। जो साँस को भी देखता है।
वही रीना है। वही आप हैं।
और एक बात —
साँस तो अपने बस में भी नहीं। वह तो अपने आप चलती है — बिना पूछे।
जो अपने बस में नहीं, जो पराए सहारे चलती है —
वह मालिक कैसे? वह “मैं” कैसे?
अब जोड़कर देखिए
तीन बातें हुईं —
एक — प्राण हवा है। और हवा मैं नहीं।
दो — प्राण धौंकनी जैसा है। कुछ जानता नहीं। और मैं तो जानने वाला हूँ।
तीन — प्राण अपने बस में नहीं। और मैं वह हूँ जो नींद में भी रहता है, सबको जानता है।
तो नतीजा साफ़ —
साँस बहुत ज़रूरी है। लेकिन साँस “मैं” नहीं।
जैसे घर में बिजली ज़रूरी है — पर बिजली घरवाला नहीं।
वैसे ही शरीर में प्राण ज़रूरी है — पर प्राण “मैं” नहीं।
मैं वह हूँ — जो साँस को भी जानता है।
“अभी साँस तेज़ है… अभी धीमी है…” — यह जानने वाला।
आज का अभ्यास
आज बहुत सुंदर अभ्यास है।
दिन में एक बार, आराम से बैठिए।
आँखें बंद कीजिए।
और बस अपनी साँस को देखिए।
भीतर आई… बाहर गई… भीतर आई… बाहर गई…
कुछ कीजिए मत। बस देखिए।
और फिर धीरे से अपने आप से पूछिए —
“साँस आ-जा रही है… और मैं उसे देख रहा हूँ…”
“तो मैं साँस हूँ — या देखने वाला?”
बस यहीं ठहर जाइए।
जवाब शांति में मिलेगा।
आखिरी बात
दो परतें हट गईं।
शरीर — दिखता है, इसलिए मैं नहीं।
साँस — आती-जाती है, कुछ जानती नहीं, इसलिए वह भी मैं नहीं।
याद रखिए वही सूत्र —
जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।
अगली बार हटाएँगे तीसरी परत —
मन की परत। मनोमय कोश।
और वह तो सबसे रोचक होगी —
क्योंकि वहाँ मिलेंगे आपके विचार, आपकी भावनाएँ, आपके सुख-दुख।
क्या वे “मैं” हैं?
अगली कड़ी में देखेंगे।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ प्राणमय कोश = प्राण + काम करने वाले पाँच अंग — यही शरीर को चलाता है ✅ पर प्राण हवा का रूप है — और हवा “मैं” नहीं ✅ प्राण धौंकनी जैसा है — कुछ जानता नहीं; “मैं” तो जानने वाला हूँ ✅ प्राण अपने बस में नहीं — नींद में भी अपने आप चलता है
🙏 जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।
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